Shri Champat Rai

International General Secretary (VHP)

गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज - एक प्रेरणादायी जीवन 350वें प्रकाश पर्व के अवसर पर श्रद्धा समर्पण  (March 15, 2017)

सम्पूर्ण संसार में फैला सिक्ख समाज दशम गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के प्रकाश पर्व (जन्मदिन) का 350वाँ वर्ष मना रहा है। 350 वर्ष पहले पौष शुक्ल सप्तमी को पटना में माता गुजरी ने एक बालक को जन्म दिया, बालक को पटना के विद्वानों ने ‘‘गोविन्द’’ नाम दिया। यह ऐतिहासिक शोध का विषय है कि आखिर किन परिस्थितियों में गुरू तेग बहादुर सिंह पंजाब से चलकर पटना पहुँचे और अपनी धर्मपत्नी को पटना में ही रोककर वे अकेले आगे की यात्रा पर निकल पड़े। शायद तीर्थयात्रा के दौरान ही उन्हें खबर मिली होगी कि घर में एक बालक आया है। पटना के विद्वान शिवदत्त शर्मा जी ने उस बालक को गोविन्द कहा और कहा कि ये तो एक अद्भुत, दिव्य, शक्ति सम्पन्न बालक है। बालक पटना में ही पला, चलने फिरने लगा, सम आयु के मित्रों के साथ खेलने लगा।

ऐसा वर्णन आता है कि एक बार पटना के मुस्लिम नवाब शहर में जा रहे थे, नवाब के सेवकों ने, सिपाहियों ने बच्चों से कहा कि नवाब को सलाम करों, गोविन्द ने सलाम करने से इंकार कर दिया और अपने साथियों को भी सलाम नहीं करने दिया। छोटा सा बालक जन्म से ही स्वाभिमान के संस्कार लेकर पैदा हुआ।

पिता जी वापस आए और पंजाब के लिए चल दिए। काशी, प्रयागराज व अयोध्या के दर्शन बालक को कराती हुई माताजी पंजाब पहुँची।

यह इतिहास सर्वज्ञात है कि आस-पास के हिन्दू गुरू तेग बहादुर जी के पास आए, अपने कष्ट बताये, इस्लाम के अनुयायी हमें सता रहे है, हमें मुसलमान बनने के लिए दबाव डाल रहे है, मना करने पर जान से मारने की धमकी देते है, गुहार लगाई-गुरूदेव हमारी रक्षा करों। सुना और पढ़ा जाता है कि गुरू तेग बहादुर जी के मुँह से निकला कि ये धर्म किसी महापुरुष का बलिदान चाहता है। सम्भवतः उस समय उन्हीं के पास खड़ा 9 वर्ष आयु का उनका पुत्र गोविन्द पिता जी को कहता है आपसे बड़ा कौन है, आप ही बलिदान दे दीजिए। अपने पिता को बलिदान की प्रेरणा देने वाला किशोर आयु का कौन सा दूसरा बालक इतिहास के पन्नों में पाया जाता है ? शायद दूसरा कोई नहीं मिलेगा और फिर सब जानते है कि तत्कालीन अत्याचारी इस्लामिक सत्ता के द्वारा गुरू जी को दिल्ली लाया गया। इस्लाम स्वीकार नहीं करने के कारण, आज दिल्ली के चांदनी चैक में जहाँ गुरूद्वारा शीशगंज है वहीं गुरू तेग बहादुर सिंह जी को शहीद किया गया। अन्याय के विरुद्ध अपने पिता को बलिदान की प्रेरणा देने वाले बालक गोविन्द का यह कार्य पीढ़ियों तक समाज को प्रेरणा देता रहेगा। अपने पिता को बलिदान की प्रेरणा देने की यह घटना पंजाब के जिस स्थान पर हुई वह स्थान ही आज कीरतपुर साहब के नाम से जाना जाता है।

गोविन्द राय बड़े होते है, निकट की पहाड़ियों में स्थित नैना देवी में जाकर एक वर्ष तक माँ भगवती का महायज्ञ किया, (नैना देवी आज हिमाचल प्रदेश में है)। इस कार्य के लिए काशी के विद्वानों को बुलाया। उपासना में उन्होंने देश, धर्म और समाज की रक्षा के लिए, अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष के लिए आवश्यक शक्ति माँ भगवती से अवश्य मांगी होगी, माँ ने वह शक्ति प्रदान की।

अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष प्रारम्भ करने से पहले गुरू गोविन्द राय जी के मन में यह विचार अवश्य आया होगा कि सारे हिन्दुस्तान की सम्मिलित शक्ति के साथ मिलकर अत्याचारों का मुकाबला करेंगे। उन्होंने संगत (सम्मेलन) बुलाई। पूज्य पिता जी के शिष्य जहाँ-जहाँ थे उन सबको बुलाया। देश का प्रत्येक कोना आया। (यह संगत जिस स्थान पर हुई वह स्थान ही आज पंजाब में अनन्दपुर साहब के नाम से जाना जाता है)।

गुरू गोविन्द राय जी ने संगत का आह्वान किया कि धर्म की रक्षा के लिए शीश चाहिए। गुरू जी ने पाँच बार शीश देने का आह्वान किया, एक-एक करके पाँच युवक खड़े हुये, अलग-अलग राज्यों के, अलग-अलग जातियों के। कोई खत्री, कोई नाई, कोई धोबी। भारत की एकता, एकात्मता, सामाजिक समरसता और देश के लिए प्रणोत्सर्ग का यह अद्भुत उदाहरण है। गुरू जी ने घोषणा की कि ये मेरे खालसा है। खालसा यानी शुद्ध, केवल बहादुर, युद्ध के मैदान में केवल विजय प्राप्त करने वाले। वे पाँचों युवक ही पंच प्यारे कहलाये।

एक बड़े बर्तन में पानी में मिष्ठान घोला गया, खड़ग से उस मीठे जल को स्पर्श कराया गया, घोषणा की कि यह अमृत है, इसका पान करों। पांचों शिष्यों को अमृत पान कराया, अमृत छकाया, पांचों शिष्य बन गये। परन्तु गुरू गोविन्द राय जी ने फिर उन शिष्यों से स्वयं अपने लिए अमृत लिया और अमृत पान किया। ये कैसा अद्भुत उदाहरण है, दुनिया में पहले शिष्य बनाये और उन शिष्यों से अमृत छक कर स्वयं उन शिष्यों के ही शिष्य बन गये। यहीं से खालसा की स्थापना भी हो गई। पुरुषार्थ जागरण के लिए अपने नाम के साथ ‘‘सिंह’’ लगाने का आदेश हो गया, गुरू गोविन्द राय अब गुरू गोविन्द सिंह बन गये। अन्य सब शिष्य भी सिंह हो गये। केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कच्छा अर्थात्यो द्धा का वेश (पंच ककार) की परम्परा चल पड़ी। सिक्ख समाज का आज का बाहरी रूप यहीं से प्रारम्भ हुआ है। सब जातियों के लोग जिन्होंने गुरू गोविन्द सिंह जी से अमृत छका, उनके शिष्य (सिक्ख) अपने नाम के साथ सिंह लिखने लगे।

गुरू गोविन्द सिंह जी ने घोषणा की कि जब मेरा एक-एक खालसा वीर योद्धा सवा-सवा लाख सैनिकों से लड़ेगा तभी गुरू गोविन्द सिंह नाम सार्थक होगा। समाज के अन्दर व्याप्त भय को चीरकर पुरुषार्थ का जागरण करने जो कार्य अत्याचारी औरंगजेब के काल में महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया है, वहीं कार्य उत्तर भारत मंे गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के द्वारा हुआ है।

गुरू गोविन्द सिंह जी के चार पुत्र थे, इस्लाम के अत्याचारों के विरुद्ध युद्ध का काल था, चारों पुत्र पिता से अलग हो गये, दो पुत्र सरहिंद के किले की दीवार में इस्लामिक अत्याचारी सत्ता ने चिनवा दिये। अन्य दो भाई चमकौर के दुर्ग में लड़ते हुए मारे गये। गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज को जब समाचार मिला कि चारों पुत्र धर्म की रक्षा के लिए बलिदान हो गये, तब गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज रोये नहीं, दुःख प्रकट नहीं किया, अपितु बोले कि चार पुत्र चले गये तो क्या हुआ मेरे हजारों पुत्र अभी जिन्दा है। कौन है ये हजारों बेटे ? ये हजारों पुत्र है शेष सम्पूर्ण हिन्दू समाज।

इस प्रकार सारे समाज को अपना पुत्र मानकर आचरण करने वाला, पुत्रों के बलिदान पर दुःख प्रकट न करने वाला, अपने पिता को भी धर्म की रक्षा के लिए बलिदान की प्रेरणा देने वाला, किशोर अवस्था से ही स्वाभिमानी ऐतिहासिक पुरुष इस भारत की धरती पर जन्मा, उन्होंने माँ भगवती के जीवन पर ग्रंथ लिखा, हिन्दू धर्म में माने जाने वाले सभी अवतारों की गाथा लिखी, स्वयं अपना जीवन लिखते हुए उन्होंने लिखा कि मेरा तो जन्म ही धर्म की रक्षा और दुष्टों के निवारण के लिए हुआ है। गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज ने कभी नहीं कहा कि मैं इस्लाम के विरुद्ध लड़ रहा हूँ, वे कहते थे कि मैं तो अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध समाज की रक्षा के लिए कार्य कर रहा हूँ।

गुरू जी ने विदेशी आक्रांताओं का मार्ग सदैव के लिए बंद कर दिया, परन्तु कभी इस विजय का श्रेय स्वयं नहीं लिया, इसके विपरीत उन्होंने कहा यह विजय तो बलिदानी सिक्खों की कृपा से प्राप्त की है, अन्यथा मेरे जैसे अनेकों गरीब इस संसार में पड़े है।

ऐसे पुरुष का जीवन प्रत्येक भारतीय को, चाहे वह भारत में रहता है अथवा भारत के बाहर अन्य किसी देश में, बारम्बार स्मरण करना चाहिए। उनका जीवन सभी को प्रेरणा देगा। ऐसे महापुरुष के चरणों में मैं बारम्बार मस्तक नमन करता हूँ।

विश्व हिन्दू परिषद भारत के कार्यकर्ताओं ने ये संकल्प लिया है कि हम हर जिले में गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के ऊपर एक कार्यक्रम करेंगे और उनका जीवन समाज को बतायेंगे। हम सब दशम् गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते है। सारे भारत वर्ष को भी, सारे संसार में फैले हुए भारतीयों को गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज के इस जीवन को पढ़ाना चाहिए, मनन करना चाहिए और अपनी संतानों को भी पढ़ने की प्ररेणा देनी चाहिए। इतना ही सब बन्धुओं से मेरा निवेदन है।

Shri. Champat Rai - International General Secretary (VHP)
suren_sharma_30@yahoo.com



रामोत्सव 2017 पर श्रीराम जन्मभूमि के तथ्य : Talking Points  (March 14, 2017)

1. अयोध्या का विवाद मंदिर अथवा मस्जिद का सामान्य विवाद नहीं है यह भगवान की जन्मभूमि को वापस प्राप्त करने का संघर्ष है। यह हिन्दुस्थान के स्वाभिमान का संघर्ष है। विदेशी आक्रान्ताओं की याद दिलाने वाले सभी चिन्ह् अब भारत से हटने ही चाहिए।

2. हिन्दू समाज की धारणा है कि अयोध्या के मोहल्ला रामकोट में जिस स्थान पर तीन गुम्बदों वाला ढाँचा खड़ा था वहाँ कभी एक मन्दिर था जो राम जन्मभूमि मन्दिर कहलाता था। इस मन्दिर को ईसवी सन् 1528 में बाबर के आदेश पर तोड़ा गया। हम यह स्थान वापस लेकर ही शान्त होंगे।

3. इसके विपरीत मुस्लिमों का तर्क था कि तीन गुम्बदों वाला विवादित ढाँचा सरयू नदी के किनारे खाली पड़ी बंजर भूमि पर इबादत के लिए बनाया गयाए कोई मन्दिर नहीं तोड़ा गया अतः इस ढाँचे को सार्वजनिक मस्जिद घोषित किया जाए।

4. वर्ष 1991 में मुस्लिम नेतृत्व ने तत्कालीन प्रधानमंत्री महोदय को वचन दिया था कि यदि यह सिद्ध हो गया कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई है तो वे स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप देंगे।

5. 6 दिसम्बर 1992 को जब वह जीर्ण-शीर्ण ढाँचा ढह गया तो उसकी खोखली दीवारों में से प्राचीन मन्दिर के खण्डित अवशेष निकले साथ ही साथ दीवार में चिना गया एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ। ये सभी वस्तुएँ न्यायपालिका के संरक्षण में अयोध्या में सुरक्षित रखीं हैं।

6. जनवरी 1993 में तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय से एक प्रश्न का उत्तर चाहा था। राष्ट्रपति महोदय का प्रश्न था कि "अयोध्या में बाबरी मस्जिद जिस स्थान पर खड़ी थी उस स्थान पर क्या इसके निर्माण के पहले कोई हिन्दू धार्मिक भवन अथवा कोई हिन्दू मन्दिर थाए जिसे तोड़कर वह ढाँचा खड़ा किया गया ?"... इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी यही प्रश्न प्रमुखता से उठा कि हिन्दू समाज जिस स्थान को भगवान श्रीराम की जन्मभूमि मानता है वहाँ बाबर के आक्रमण के पहले कभी कोई मन्दिर था अथवा नहीं था

7. सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार से यह प्रश्न पूछे जाने का कारण जानना चाहा था तब भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सितम्बर 1994 ई0 में शपथपत्र दिया था कि यदि यह सिद्ध हो गया कि मंदिर तोड़कर तीन गुम्बदों वाले ढाँचे का निर्माण किया गया है तो भारत सरकार हिन्दू समाज की भावनाओं के अनुसार कार्य करेगी और यदि यह सिद्ध हुआ कि उस स्थान पर कभी कोई मन्दिर नहीं था अतः कुछ भी तोड़ा नहीं गया तो भारत सरकार मुस्लिमों की भावनाओं के अनुसार व्यवहार करेगी।

8. यह प्रश्न ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुख्य प्रश्न बना था। इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने जन्मभूमि के स्थान के नीचे राडार तरंगों से फोटोग्राफी कराई। फोटोग्राफी करने वाले (कनाडा के) विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि जमीन के नीचे दूर-दूर तक भवन के अवशेष उपलब्ध हैं। इन्हें देखने के लिए वैज्ञानिक उत्खनन किया जाना चाहिए।

9. कनाडा के भू-वैज्ञानिक की सलाह पर उच्च न्यायालय ने भारत सरकार के पुरातत्व विभाग को उत्खनन का निर्देश दिया था। वर्ष 2003 में 6 महीने तक उत्खनन हुआ। 27 दीवारें मिलीं दीवारों में नक्काशीदार पत्थर लगे हैं 52 ऐसी रचनाएँ मिलीं जिन्हें खम्भों का जमीन के नीचे का आधार कहा गया भिन्न-भिन्न स्तर पर 4 फर्श मिले पानी की पक्की बावड़ी व उसमें उतरने के लिए अच्छी सुन्दर सीढ़ियाँ मिलीं एक छोटे से मन्दिर की रचना मिली जिसे पुरातत्ववेत्ताओं ने 12वीं शताब्दी का हिन्दू मन्दिर लिखा। पुरातत्ववेत्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में यह लिखा कि उत्खनन में जो-जो वस्तुएँ मिली हैं वे सभी उत्तर भारतीय शैली के हिन्दू मन्दिर के वस्तुएँ हैं। अतः इस स्थान पर कभी एक मन्दिर था।

10. पुरातत्व विभाग की इस रिपोर्ट के आधार पर ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 15 वर्षों की सघन वैधानिक कार्यवाही के पश्चात अपने निर्णय में लिखा.

A. विवादित स्थल ही भगवान राम का जन्मस्थान है। जन्मभूमि स्वयं में देवता है और विधिक प्राणी है। जन्मभूमि का पूजन भी रामलला के समान ही दैवीय मानकर होता रहा है और देवत्व का यह भाव शाश्वत है यह सर्वत्र रहता है और हर समय रहता है और यह भाव किसी भी व्यक्ति को किसी भी रूप में भक्त की भावनाओं के अनुसार प्रेरणा प्रदान करता है। देवत्व का यह भाव निराकार में भी हो सकता है। (न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

B. हिन्दुओं की श्रद्धा व विश्वास के अनुसार विवादित भवन के मध्य गुम्बद के नीचे का भाग भगवान राम की जन्मभूमि है...! (न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल)

C. यह घोषणा की जाती है कि आज अस्थायी मन्दिर में जिस स्थान पर रामलला का विग्रह विराजमान है वह स्थान हिन्दुओं को दिया जाएगा ..... (न्यायमूर्ति एसण् यूण् खान)

D. न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने निर्मोही अखाड़ा द्वारा वर्ष 1959 में तथा सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड द्वारा दिसम्बर 1961 में दायर किए गए मुकदमों को निरस्त कर दिया और निर्णय दिया कि "निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड को कोई राहत नहीं दी जा सकती।"

E. विवादित ढाँचा किसी पुराने भवन को विध्वंस करके उसी स्थान पर बनाया गया था। पुरातत्त्व विभाग ने यह सिद्ध किया है कि वह पुराना भवन कोई विशाल हिन्दू धार्मिक स्थल था .....। (न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

F. विवादित ढाँचा बाबर के द्वारा बनाया गया था ..... यह इस्लाम के नियमों के विरुद्ध बनाए इसलिए यह मस्जिद का रूप नहीं ले सकता। (न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

G. तीन गुम्बदों वाला वह ढाँचा किसी खाली पड़े बंजर स्थान पर नहीं बना था बल्कि अवैध रूप से एक हिन्दू मन्दिर/पूजा स्थल के ऊपर खड़ा किया गया था।

H. एक गैर इस्लामिक धार्मिक भवन अर्थात हिन्दू मन्दिर को गिराकर विवादित भवन का निर्माण कराया गया था। (न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल)

I. प्रत्यक्ष साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध नहीं किया जा सका कि निर्मित भवन सहित सम्पूर्ण विवादित परिसर बाबर अथवा इस मस्जिद को निर्माण कराने वाले व्यक्ति अथवा जिसके आदेश से यह भवन बनाया गया, उसकी सम्पत्ति है"। न्यायमूर्ति एस. यू. खान का यह निष्कर्ष विवादित भवन के वक्फ होने पर प्रश्नचिन्ह् लगाता है।

11. इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार जोर.जबरदस्ती से प्राप्त की गई भूमि पर पढ़ी गई नमाज अल्लाह स्वीकार नहीं करते हैं और न ही ऐसी सम्पत्ति अल्लाह को समर्पित (वक्फ) की जा सकती है। किसी मन्दिर का विध्वंस करके उसके स्थान पर मस्जिद के निर्माण करने की अनुमति कुरआन व इस्लाम की मान्यताएं नहीं देती। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कुरआन व इस्लाम की मान्यताओं का उल्लेख करते हुए यह निर्णय दिया कि विजेता बाबर को भी विवादित भवन को मस्जिद के रूप में अल्लाह को समर्पित (वक्फ) करने का अधिकार नहीं था।

12. भगवान रामलला के अधिकार को स्थापित करने में केवल एक ही बाधा है वह है न्यायमूर्ति एस. यू. खान व न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल द्वारा विवादित परिसर का तीन हिस्सों में विभाजन अर्थात भगवान रामलला निर्मोही अखाड़ा तथा सुन्नी वक्फ बोर्ड तीनों ही विवादित परिसर का 1/3 भाग प्राप्त करेंगे। यह ध्यान देने योग्य है कि यह मुकदमा सम्पत्ति के बंटवारे का मुकदमा नहीं था और निर्मोही अखाड़ा अथवा सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड अथवा रामलला विराजमान तीनों में से किसी ने भी परिसर के बंटवारे का मुकदमा दायर नहीं किया था और न ही परिसर के बंटवारे की माँग की थी। अतः बंटवारे का आदेश देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करते समय इसी आशय की मौखिक टिप्पणी एक न्यायाधीश ने की थी।

13. फैजाबाद के जिला न्यायालय में पहला मुकदमा वर्ष 1950 में दायर हुआ था। जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 30 सितम्बर 2010 को इसका फैसला दियाए निर्णय प्राप्त करने में 60 वर्ष लगे। सभी पक्षकारों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की हैं। सर्वोच्च न्यायालय में कितना समय लगेगाए यह भविष्यवाणी नहीं हो सकती।

14. द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक सोमनाथ के मन्दिर के सम्बन्ध में भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने त्वरित कार्यवाही की थी। नवम्बर 1947 में गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने जूनागढ़ की एक मीटिंग में यह घोषणा की थी कि सरकार सोमनाथ मन्दिर का पुनर्निर्माण करेगी (परन्तु सरकारी पैसे से नहीं) और भगवान शंकर के ज्योतिर्लिंग की पुनप्र्रतिष्ठा की जाएगी जो कि भारत के हिन्दू समाज की भावनाओं एवं सम्मान का प्रतीक होगा। सरदार पटेल के इस निर्णय को पंडित नेहरू की स्वीकृति एवं महात्मा गाँधी का समर्थन प्राप्त था। भारत के तत्कालीन खाद्य एवं कृषि मंत्री के. एम. मुंशी मन्दिर पुनर्निर्माण समिति के अध्यक्ष थे। भारत के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद ने नव निर्मित मन्दिर में ज्योतिर्लिंग स्थापित किया था। उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा था कि राख में से ऊपर उठते हुएए पुनप्र्रतिष्ठित भगवान सोमनाथ का यह मन्दिरए संसार में यह घोषणा करता है कि विश्व का कोई भी व्यक्ति या शक्ति ऐसी किसी वस्तु या स्थान को नष्ट करने का अधिकार नहीं रखती जिसके प्रति आम जनमानस की अगाध श्रद्धा व विश्वास हो।

15. जन्मभूमि की अदला-बदली नहीं की जाती। यह न खरीदी जा सकती है न बेची जा सकती है और न ही दान दी जा सकती। यह अपरिवर्तनीय है।

16. सम्पूर्ण विवाद अधिक से अधिक 1500 वर्ग गज भूमि का है, जिसकी लम्बाई-चैड़ाई अधिकतम 140 x 100 फीट होती है। भारत सरकार द्वारा अधिग्रहीत 70 एकड़ भूमि इससे अलग है तथा वह भारत सरकार के पास है जिस पर कोई मुकदमा अदालत में लम्बित नहीं है। इसी 70 एकड़ भूखण्ड में लगभग 45 एकड़ भूमि श्रीराम जन्मभूमि न्यास की है। इस भूमि का अधिग्रहण होने के बाद भी श्रीराम जन्मभूमि न्यास ने भारत सरकार से कभी कोई मुआवजा नहीं लिया।

17. सम्पूर्ण विवादित स्थल व अधिग्रहीत जमीन रामलला विराजमान की है। यह भगवान की जन्मभूमिए लीलाभूमि व क्रीड़ाभूमि है।

18. जन्मभूमि को प्राप्त करने का संघर्ष ई0 सन् 1528 से निरन्तर जारी है। इस संघर्ष को अयोध्या का संत-समाज और आस-पास के राजा-महाराजा लड़ रहे थे। 76 संघर्षों का वर्णन इतिहास के पन्नों में मिलता है। ये संघर्ष बताते हैं कि हिन्दुओं ने इस स्थान से अपना दावा कभी नहीं छोड़ा। इन संघर्षों से यह भी पता चलता है कि मुस्लिम आक्रमणकारी व उसके वंशजों का इस स्थान पर अधिकार कभी भी शांतिपूर्ण व निर्बाध नहीं रहा।

19. भगवान की जन्मभूमि होने के कारण वह स्थान हिन्दू समाज के लिए पूज्य, पवित्र तथा स्वयं में एक देवता है। मंदिर तोड़ दिये जाने के बावजूद भक्त.जन उस स्थान की परिक्रमा करके उसे साष्टांग प्रणाम करते थे। परिक्रमा का अर्थ ही है कि वह स्थान पूज्य और देवता है। परिक्रमा केवल हिन्दू मन्दिरों में ही होती है। परिक्रमा महत्वपूर्ण है गणेशजी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा की और वे प्रथम पूज्य बने। देवता खण्डित नहीं हो सकताय अतः जन्मभूमि के टुकड़े भी स्वीकार्य नहीं हैं।

20. हिन्दू समाज में मंदिर की सम्पूर्ण सम्पत्ति भगवान की होती है किसी व्यक्ति ट्रस्ट या महंत की नहीं। महंत, व्यक्ति, साधु, पुजारी, ट्रस्टी भगवान के सेवक होते हैंय स्वामी कदापि नहीं।

21. हिन्दू समाज में देवता एक जीवंत इकाई है परन्तु नाबालिग है वह अपना मुकदमा लड़ सकता है तथा सम्पत्ति का स्वामी होता है। श्रीरामजन्मभूमि सम्पत्ति न होकर स्वयं में देवता है। उसके साथ सामान्य सम्पत्ति का विवाद नही हो सकता। देवता की सम्पत्ति पर किसी का चाहे कितना भी लम्बे समय से कब्जा रहा हो वह उसका मालिक नहीं बन सकता।

22. भगवान नाबालिग हैं बोल नहीं सकते इसलिए कानूनी रूप से उन्हें एक संरक्षक चाहिए। यह संरक्षक कोई महंत अथवा कोई अन्य व्यक्ति भी हो सकता है।

23. इन मुकदमों में जो वादी नहीं हैं और प्रतिवादी भी नहीं हंै किन्तु वार्ताएं कर रहे हैं वह निरर्थक है ये सिर्फ नाम पाने की लालसा से कर रहे है।

24. बाबर कोई पैगम्बर या महापुरुष नहीं था वह केवल विदेशी आक्रांता था वह न तो भारत के वर्तमान मुसलमानों का पूर्वज था और न ही आज के मुसलमान उसके वंशज है। विदेशी आक्रमणकारी से लगाव देशभक्ति नहीं है।

25. तीन गुम्बदों वाला ढाँचा कोई धार्मिक उपासना स्थल के रूप में नहीं बनाया गया। वह तो भारत पर विदेशियों की विजय के प्रतीक के रूप में बना। वह ढाँचा भारतीयों के लिए गुलामी का प्रतीक था।

26. इस्लाम के अनुसार किसी दूसरे के स्थान पर जबरदस्ती मस्जिद बनाना इस्लाम के विरूद्ध है। ऐसे विवादित स्थान पर पढ़ी गई नमाज भी खुदा को कबूल नहीं है। मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है। नमाज कहीं पर भी पढ़ी जा सकती है। जिस प्रकार हिन्दू-परम्पराओं में मंदिर भगवान का घर है उस रूप में मस्जिद अल्लाह का घर नहीं है। यह सिर्फ एक जगह एकत्रित होकर नमाज पढ़ने का स्थान है।

27. मस्जिद के लिए आवश्यक है कि किसी भी भूमि को मस्जिद बनवाकर अल्लाह को समर्पित करने वाला व्यक्ति (अर्थात् वाकिफ) उस भूमि का असली मालिक होना चाहिए अर्थात् जमीन अविवादित रूप से खरीदी गई हो। अर्थात् सभी प्रकार के विवादों से परे हो तभी उस जमीन पर मस्जिद बनाकर उसे अल्लाह को समर्पित किया जा सकता है। किसी और की सम्पत्ति अल्लाह को समर्पित नहीं की जा सकती।

28. युद्ध में जीतने के कारण ही बाबर जमीन का मालिक नहीं बन सकता। वह केवल भूमि का लगान इकट्ठा करने का अधिकारी हो सकता था। वहाँ पर अजान के लिए कोई मीनार नहीं थी। बजू (हाथ-पैर धोने का स्थान) की कोई व्यवस्था नहीं थी। तब वह ढाँचा मस्जिद था ही नहीं।

29. समझौते के प्रयास स्वयं श्री राजीव गाँधी व श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री-काल में हुये किन्तु सब असफल रहे। सबसे ईमानदार प्रयास श्री चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्री-काल में हुये किन्तु वे भी सफल नहीं हो सके। इसलिए आज कुछ व्यक्ति विशेष वार्ता की चर्चा करें तो यह बात आधारहीन ही लगती है।

30. कारसेवक अनुशासन-हीन नही थे। उन्होंने संतों द्वारा घोषित दिनांक व समय का पूरा पालन किया। दिल्ली में 30 अक्टूबर 1992 को धर्म संसद रानी झॉसी स्टेडियम में हुई थी। इसमें तीन हजार से अधिक संतों ने 6 दिसम्बर 1992 को 11:45 बजे गीता-जयन्ती के दिन कारसेवा का समय निश्चित किया थाय जिसका कारसेवकों ने अक्षरशः पालन किया। न अयोध्याए फैजाबाद में कोई लूट-पाट हुई तथा न ही कार-सेवकों के आने-जाने के मार्ग में।

31. अयोध्या-फैजाबाद व कारसेवकों के मार्ग में पड़ने वाले तमाम गाँवों की जनता ने जाति-बिरादरी के भेद मिटाकर रामभक्तों का स्वागत कियाए भोजन करायाए घरों में टिकाया शीत से उनकी रक्षा की। परिवारों में एक भी अनहोनी नहीं हुई। कारण था कि कारसेवक एक महान उद्देश्य की प्राप्ति-हेतु आये थे।

32. अनेक लोग कहते हैं कि मंदिर-मस्जिद पास-पास में बनाने से शांति हो जायेगी। यह बात निराधार है। सन् 1885 में न्यायाधीश कर्नल चैमियर ने अभिमत दिया था कि मस्जिद व मंदिर एक साथ रहने पर शांति कायम रखने की समस्या हमेशा बनी रहेगी। मंदिर और मस्जिद एक साथ नहीं रह सकते अनुभव के आधार पर यह आज भी सत्य है।

33. मुसलमानों ने अदालत में कहा कि मंदिर के घंटे की आवाज शैतान की आवाज है। नमाज तो शांति व मौन भाव से की जाती है जबकि भगवान की आरती घंटे-घडियालए नगाड़े के साथ धूम-धाम से होती है। दोनों में सामंजस्य बैठ ही नहीं सकता। भारत के कोने-कोने में नमाज के समय नेताओं के भाषणों का माइक बंद करना पड़ता है बारात का बाजा बंद करना पड़ता है जलूस के ढोल बंद करने पड़ते हैं। अन्यथा दंगे होते हैं। अयोध्या में मंदिर-मस्जिद पास-पास में बनी तो अगली पीढ़ी की शांति भी छिन जायेगी और आपसी झगड़ों का बीजारोपण होगा।

34. अयोध्या में आज भी एक दर्जन से अधिक ऐसी मस्जिदें हैं जहाँ कोई नमाज पढ़ने नहीं जाता। वे 6 दिसम्बर 1992 को भी थीं। सब पुरानी है कोई नई नहीं है। 6 दिसम्बर के बाद तक लाखों उत्साही नौजवान रामभक्त अयोध्या में उपस्थित रहेय किन्तु उन्होंने किसी मस्जिद को छुआ तक नहीं किसी मुसलमान के घर को नुकसान नहीं पहुँचाया अयोध्या में मुस्लिम व्यापारी भी हंैए मुस्लिम आबादी है किन्तु सब सुरक्षित रहे।

35. मंदिर के निर्धारित प्रारूप के लिए 3 लाख गाँवों के 6 करोड़ हिन्दुओं द्वारा पूजन करके रामशिलायें अयोध्या भेजी गई थीं। वे शिलाएँ सुरक्षित हैं।

36. गर्भगृह वहीं बनेगा जहां रामलला विराजमान हैं तथा मंदिर उन्हीं संतों के कर-कमलों से बनेगाय जिन्होंने 1984 से आज तक इस आंदोलन का लगातार नेतृत्व व मार्गदर्शन किया है। राम जन्मभूमि न्यास एक वैधानिक न्यास है। अयोध्या की मणिरामदास छावनी के श्री महंत पूज्य नृत्यगोपाल दास जी महाराज इसके कार्याध्यक्ष हैं। मंदिर उसी प्रारूप का बनेगा जिसके चित्र विश्व के करोड़ों हिन्दू.घरों में विद्यमान हैं।

37. गुलामी के चिन्ह हटाने का यह आंदोलन न भारत के लिए नया है न दुनिया के लिए। सोमनाथ मन्दिर का पुनर्निर्माण गुलामी के चिन्ह हटाने का ही प्रमाण है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् दिल्ली में इण्डिया गेट के नीचे रखी अंग्रेज की मूर्ति हटाई गई। भारत के जिस शहर में भी विक्टोरिया की मूर्ति थी हटाई गई। सम्पूर्ण देश की अनेक सड़कों पार्कों अस्पतालों पुलों व रेलवे स्टेशनों और यहाँ तक की शहरों तक के नाम बदलकर गुलामी के प्रतीकों को समाप्त किया गया।

38. देश के सबसे बड़े राजमार्ग जीटी रोड का नाम महात्मा गांधी मार्ग कम्पनी गार्डन का नाम गांधी पार्क इरविन अस्पताल का नाम डॉण् जयप्रकाश नारायण अस्पतालए मिन्टो ब्रिज का नाम शिवाजी ब्रिज एल्फ्रेड पार्क का नाम आजाद पार्क मुम्बई के विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन का नाम छत्रपति शिवाजी स्टेशन रखा गया। इसके अलावा मुम्बई कोलकाता चेन्नई इत्यादि नाम भी गुलामी को समूल नष्ट करने के प्रयास के अंतर्गत ही बदले गये।

39. हिन्दुओं के लिए अयोध्या का उतना ही महत्व है जितना मुस्लिमों के लिए मक्का का है मक्का में कोई गैर मुस्लिम प्रवेश नहीं कर सकता। अतः अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा में कोई नई मस्जिदध्स्मारकध्इस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्र नहीं बन सकता।

40. भारत का राष्ट्रीय समाज अपेक्षा करता है कि-

A. मुस्लिम समाज अपने द्वारा सरकार को दिए गए वचन का पालन करे और स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप दें।

B. भारत सरकार अपने शपथ पत्र का पालन करे और राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा के लिए वर्ष 1993 में भारत सरकार द्वारा अधिगृहीत सम्पूर्ण 70 एकड़ भूमि श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण हेतु हिन्दू समाज को सौंप दे।

C. श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के लिए सोमनाथ मन्दिर की तर्ज पर संसद में कानून बने।

D. यह सुनिश्चित किया जाए कि अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा के भीतर कोई भी नई मस्जिद अथवा इस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्रध्स्मारक का निर्माण नहीं होगा।

Shri. Champat Rai - International General Secretary (VHP)
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